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।। जीरो टॉलरेंस का सच: मुख्यमंत्री के गृह जनपद में वसूली की ‘रेट लिस्ट’।।

।। खाकी और खादी की नाक के नीचे: 5000 में गांजा और 25000 में फर्जी पासपोर्ट।।

अजीत मिश्रा (खोजी)

गोरखपुर का ‘भ्रष्टाचार रेट कार्ड’: क्या सुशासन केवल विज्ञापनों तक सीमित है?

शनिवार 17 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

गोरखपुर।। उत्तर प्रदेश की सत्ता का केंद्र और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह जनपद इन दिनों एक शर्मनाक वजह से चर्चा में है। जिस जिले को ‘जीरो टॉलरेंस’ का मॉडल होना चाहिए था, वहां सरकारी दफ्तरों से लेकर गलियों तक भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब अवैध कामों और सरकारी योजनाओं के लिए बाकायदा “रेट कार्ड” तय कर दिए गए हैं।

⭐आम जनता की जेब पर डाका

हैरानी की बात यह है कि जो प्रमाण पत्र एक नागरिक का अधिकार हैं, उन्हें हासिल करने के लिए बोली लगानी पड़ रही है। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए 500 से 5000 रुपये और जाति प्रमाण पत्र (ST) के लिए तो 25,000 रुपये तक की अवैध वसूली की जा रही है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन इतना अंधा हो चुका है कि उसे जनता की यह चीखें सुनाई नहीं दे रहीं?

⭐अवैध धंधों का ‘सरकारी’ संरक्षण?

अखबार में छपी रिपोर्ट के अनुसार, जिले में केवल प्रमाण पत्रों का ही खेल नहीं चल रहा, बल्कि अपराधों का भी “मासिक किराया” फिक्स है।

🙈अवैध खनन: एक रात के लिए 1000 से 5000 रुपये।

🙈गांजा और शराब: 5000 से 25,000 रुपये प्रति महीना।

🙈अवैध अस्पताल: 15,000 से 30,000 रुपये तक का चढ़ावा।

जब अवैध कार्यों की दरें इस तरह सरेआम तय हों, तो यह मानना मुश्किल है कि जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी भनक नहीं है। क्या यह मान लिया जाए कि ‘ऊपर’ तक हिस्सा पहुंच रहा है, इसीलिए कार्रवाई के नाम पर केवल सन्नाटा पसरा है?

⭐विकास या विनाश का कमीशन?

विकास कार्यों में 30% तक का कमीशन सीधे तौर पर यह बताता है कि बनने वाली सड़कें और इमारतें कितनी गुणवत्तापूर्ण होंगी। मुख्यमंत्री के अपने क्षेत्र में अगर 25% से 30% पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है, तो बाकी प्रदेश के हालात की कल्पना करना भी डरावना है।

“सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन के लिए 5000 रुपये से अधिक की मांग करना केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध है।”

⭐सिस्टम की चुप्पी पर सवाल

यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान शासन प्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। जिम्मेदार अधिकारी ‘मूकदर्शक’ बने हुए हैं, जो उनकी मौन संलिप्तता को दर्शाता है। अगर मुख्यमंत्री के गृह जनपद में जनता का इस कदर शोषण हो रहा है, तो ‘रामराज्य’ की बातें केवल खोखली नारेबाजी प्रतीत होती हैं।

जनता पूछ रही है— क्या इन रेट कार्ड्स को फाड़ने वाला कोई बचा है, या भ्रष्टाचार की इस बहती गंगा में सबने हाथ धो लिए हैं?

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